Sunday, October 2, 2011

chaand ka khaalipan

आज षष्ठी का चाँद आसमान में लटक रहा था,
कुछ यूँ, जैसे किसी छोटे बच्चे ने एक कटोरी हाथ में लटका रखी हो,
इस आस में कि शायद कहीं से कुछ आ गिरे उसमें,
कई बार तारों से उसे भरने कि कोशिश करी है,
लेकिन सब छलक जाते हैं,
कटोरी सीधी नहीं रह पाती है,
काश गरबा से पेट भी भर जाता.
कटोरी जितनी खाली होती जाती है,
अँधेरा उतना ही गहराता जाता है,
महीने में एक ही दिन भरी कटोरी मिल पाती है.

चलो इस बार कुछ यूँ करें कि सबकी कटोरियाँ भरें,
और पूरे महीने पूरनमासी देखें!

Wednesday, August 17, 2011

Too Good Too Bad!!!

Its raining again!!!..Oo ya...It is monsoon. And not just any monsoon...its Mumbai monsoon. Like any other season, or thing, or job or relationship...or just anything...mumbai monsoons also come with their pros and cons.

The analysis of the monsoon pros and cons popped in my mind every time I was either too excited about the rains...or totally cursing them...Every positive aspect of rain directed my mind towards the dark side of it...and every negative experience made me consider the silver lining behind it...I am going to share my views of the pros and cons of Mumbai Monsoons...of whatever I have experienced since the time I have known this mahanagri.
  • The good thing about Mumbai monsoon is that it rains a lot and the bad thing about Mumbai monsoon is that it rains a lot.
  • The good thing about Mumbai monsoon is that it clears the environment...everything seems to be so clean and fresh. The bad thing about Mumbai monsoon is that it floods the city...not just with rain water but with water coming out of various levels of earth. 
  • The good thing about Mumbai monsoon is the romanticism it brings in the air. I guess every relation would have fond memories of rains and its kindling effect. The bad thing about Mumbai monsoon is the anger it provokes...You get out of your homes...and your mood is spoiled because of the damaged roads...flooding potholes...stinking garbage. And very conveniently that mood is transferred on our spouses (that's the easiest target)/friends/parents/or totally unknown strangers ...so the romanticism of monsoon is flushed out in the rain. 
  • The good thing about Mumbai monsoon is the amazing greenery...in and outside mumbai. Trips to Lonavla, Malshej, Mahabaleshwar, Kolad, Goa [:)] during monsoons have made me experience sheer bliss. The bad thing about Mumbai Monsoon is the unpredictable accidents happening and costing lives...How in the world would you guess that a tree will fall on you when you are going for a movie...It is like being ready for a terror attack 24x7...however terror attacks come with only bad things...nothing good about that! 
  • The good thing about Mumbai monsoon is the variety of food to indulge in..I love roadside stuff (I prefer a little hygienic though)  ...bhutta (corn) by the sea is one of my favorites...panipuri, sandviches or just plain moongphali (singdana as it is called in maharashtra). At home, i guess everyone's favorite is pakodas or bhajiyas with steeming ginger tea..So the monsoon has a lot to stimulate everyone's taste buds. The bad thing about Mumbai monsoon is the starvation it brings because of the floods and unemployment. How do you feel when a kid or an old person or may be just any adult approach you for money or for food while you were indulging in a nice ice cream cone (not specific to monsoon though). If the person is young, you can refuse to give anything without any guilt. But, if that person is a kid or an old person, you feel terrible...at least I feel that...Giving them money or food is not the solution...Worse thing is we (I) do not have a solution. 
Finally I am in a dilemma...whether to feel good or bad about this whole 'monsoon' thing. But one thing is for sure...however i may feel right now, I would still be waiting for the monsoon next year...eagerly...desperately!

Sunday, March 13, 2011

potli

आज अपने माज़ी की पोटली में झाँका,
 बहुत दिनों से ख्यालों के किसी कोने में दबी पड़ी थी,
 धूल जम गयी थी,
कितनी भी झाड़ो, वापस पहले जैसा रंग नहीं आ पाता,
वक़्त के दाग आसानी से नहीं धुलते! 
 लेकिन कितना ही बेरंग सही, है तो मेरा!
खोल के देखा तो उसमें कुछ पुराने लम्हे रखे थे!
खनक थी उन चाभी के गुच्छों की, जो कभी दीवार के उस पार फेंके थे,
 दुआ थी उनकी जिनपर एक रूपये का वो सिक्का गिरा था,
 बाई की हंसी थी जिससे न जाने कितनी बार माँ की शिकायत करी थी,
पायल की आवाज़ थी जो मेरी माँ की जासूस थी,
कमबख्त, मेरे हर पल की खबर देती थी,
आज कोई पायल नहीं है,
लेकिन माँ को आज भी मेरे हर पल की खबर है!

 एकाएक पोटली से एक फुव्वारा निकला,
मेरी पहली पिचकारी का होगा,
काफी बड़ी थी वो, शायद उसका पानी अभी भी बचा हो,
कम से कम उसके रंग तो पक्के हैं अभी तक,
बहुत बेरंग हो गयी है होली अब,
उन रंगों की नरमी आ जाये,
तो होली में फिर से रंग भर जाएँ!


















Thursday, February 24, 2011

safar

एक सुबह यादों के सफ़र पे निकली, मैं,
कुछ पलों को फिर से जीने की कोशिश थी,
कुनकुनी सुबह को माँ का आँचल बना के लपेट लिया,
और रौशनी को पिता की ऊँगली की तरह पकड़ के चल पड़ी, मैं,
 सफ़र में कई ऐसे पल मिले,
जिन्हें मैंने जिंदा किया था कभी,
और कई ऐसे भी थे,
जिन्होंने बुझे हुए लम्हों में,
मुझमें जान भरी थी,
पाँव ठिठक गए,
जब यादों का वो गाँव आया,
जिसमें मेरे बचपन की खुशबू अभी भी बसी हुई थी,
नानी की कहानियों से महकती हुई रातें,
नाना के दुलार से चमकता आसमान,
पड़ोस से आती तंदूर की सौंधी तपन,
उन सारे पलों को फिर से जीने की ख्वाहिश है.
राह पे चलते हुए देखा,
की मुझसे पहले भी कोई इनसे हो के गुज़रा है,
आगे बढ़ते हुए यादों पे जो सूराख बन जाते हैं,
किसी ने उन यादों की रफू करने की कोशिश की है,
राह पे बहुत से फूल बिखरे थे,
सोचा उठा के ले चलूँ सब,
यादों के सफ़र से जितना मिल जाये उतनी ज़िन्दगी आराम से कटेगी,
पर न जाने क्या हुआ,
की थोड़े से उठा के लगा जैसे मेरी झोली भर गयी,
उस दिन पता चला,
की दुआओं में बड़ा वज़न होता है!! 
  
   
 
 













Wednesday, February 23, 2011

ek Inch!


एक इंच,
इसे छोटा न समझना!

ट्रेन में किसी से कभी,
एक इंच खिसकने को कहा है?
स्टेशन पे लगी बेंच पर,
एक इंच की जगह मांगी है?

चेहरे पे ऐसी मायूसी आ जाती है,
जैसे किसी ने कश्मीर पर कब्ज़ा कर लिया हो!
या फिर,
किसी ने ताज को चिंगारी दी हो!!

थकी हारी शाम को,
आँखें मूंदे घर जाते लोग!
जो करना है, उससे आँखें मूंदे!!
जो नहीं करना है, उससे आँखें मूंदे!!

अपने चारों तरफ एक इंच का दायरा बनाकर,
बाकी सबसे आँखें मूंदे!!
शायद सोचते हौंगे,
फिर ये एक इंच हो न हो!!